Monday, 30 May 2022

वैदिक काल में नारी

नारी शब्द मातृत्व का द्योतक है। मातृत्व में ही स्त्रीत्व पूर्ण होता है।

भारतीय संस्कृति मे प्राचीन वैदिक काल से ही नारी का स्थान सम्माननीय रहा है और कहा गया है कि 

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रफलाः क्रियाः।। 

अर्थात् जिस कुल में स्त्रियों की पूजा होती है, उस कुल पर देवता प्रसन्न होते हैं और जिस कुल में स्त्रियों की पूजा, वस्त्र, भूषण तथा मधुर वचनादि द्वारा सत्कार नहीं होता है, उस कुल में सब कर्म निष्फल होते हैं।

ऋग्वेद काल में स्त्रियां उस समय की सर्वोच्च शिक्षा अर्थात् बृह्मज्ञान प्राप्त कर सकतीं थीं। ऋग्वेद में सरस्वती को वाणी की देवी कहा गया है जो उस समय की नारी की शास्त्र एवं कला के क्षेत्र में निपुणता का परिचायक है।

वेदों में अनेक स्थलों पर रोमाला, घोषाल, सूर्या, अपाला, विलोमी, सावित्री, यमी, श्रद्धा, कामायनी, विश्वम्भरा, देवयानी आदि विदुषियों के नाम प्राप्त होते हैं।

आओ हम शपथ लेते है कि जहाँ भी होंगे अपने आस-पास सारी स्त्रियों को अपनी बहन मानेंगे और उनके सम्मान के लिए अपनी जान देने तक नही संकोच करेंगे एवं कैसे भी करके उनकी रक्षा करेंगे। 



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वैदिक काल में नारी

नारी शब्द मातृत्व का द्योतक है। मातृत्व में ही स्त्रीत्व पूर्ण होता है। भारतीय संस्कृति मे प्राचीन वैदिक काल से ही नारी का स्थान सम्माननीय र...